देहरादून। उत्तराखंड के जनमानस, उसकी भावनाओं और पहाड़ी सपनों के केंद्र ‘गैरसैंण’ में जब विधानसभा का सत्र आयोजित होता है, तो राज्य की जनता को उम्मीद होती है कि उनकी समस्याओं पर गंभीरता से बात होगी। मगर इस बार जो दृश्य सामने आया, वह लोकतंत्र की उस विडंबना को उजागर करता है जिसे हम लंबे समय से सहते आ रहे हैं
मंगलवार सुबह 11 बजे गैरसैंण में सत्र शुरू होता है। पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट को श्रद्धांजलि दी जाती है, अनुपूरक बजट और नौ विधेयक पटल पर रखे जाते हैं और करीब शाम छह बजे कार्यवाही स्थगित हो जाती है। यानी छह घंटा 58 मिनट। अगला दिन यानी बुधवार आता है। ग्यारह बजे सत्र फिर शुरू होता है, बार-बार स्थगित होता है, सवा बारह बजे दोबारा बैठता है और दोपहर एक बजते-बजते अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाता है। यानी महज एक घंटा छह मिनट सदन की कार्यवाही चलती है । इस पूरी अवधि में चंद मिनट में अनपूरक बजट समेत दस विधेयक बिना चर्चा पास हो जाते हैं। कुल मिलाकर सदन आठ घंटे चार मिनट ही चलता है।विपक्ष नियम 310 के तहत मंत्री रेखा आर्य से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चर्चा की जिद पर अड़ा रहता है और वेल में आकर नारेबाजी करता है, तो वहीं स्पीकर चर्चा की अनुमति नहीं देतीं। नतीजा? गैरसैंण का यह बहुचर्चित सत्र महज सवा दिन भी पूरा नहीं चल सका।
करोड़ों रुपये खर्च करके राजधानी से दूर गैरसैंण में गाड़ियां, पूरा प्रशासनिक अमला और जनप्रतिनिधि पहुंचे। लेकिन मिला क्या? जनता के सवालों का सन्नाटा और हंगामे का शोर।
संवैधानिक मजबूरी या महज रस्म अदायगी?
यह सवाल किसी एक सत्र का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जो संविधान के लचीलेपन का फायदा उठाकर सिर्फ रस्म अदायगी कर रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(1) में केवल इतना लिखा है कि विधानसभा के दो सत्रों के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। यानी संवैधानिक बाध्यता केवल इतनी है कि साल में दो बार बैठ लो।
लेकिन क्या लोकतंत्र केवल ‘हाजिरी लगाने’ की व्यवस्था है?
विधि आयोगों और संसदीय समितियों ने बार-बार कहा है कि छोटे राज्यों में कम से कम 30 से 40 दिन और बड़े राज्यों में कम से कम 60 दिन विधानसभा चलनी चाहिए। राष्ट्रीय संविधान कार्यप्रणाली समीक्षा आयोग (NCRWC) ने तो 70 से कम विधायकों वाली विधानसभाओं के लिए भी न्यूनतम 50 दिन की सिफारिश की थी। मगर हकीकत क्या है? पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि देश की अधिकांश राज्य विधानसभाएं साल में औसतन 20-25 दिन ही चलती हैं। और जब बात उत्तराखंड की आती है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। 2017 से 2024 के बीच उत्तराखंड विधानसभा में औसतन साल में केवल 12 दिन काम हुआ है। राज्य गठन से लेकर अब तक का औसत भी 15-16 दिन से ज्यादा नहीं रहा। जब पूरे साल में 365 दिनों में से केवल 12 दिन विधानसभा चलेगी, तो क्या हम इसे जनता के प्रति जवाबदेह व्यवस्था कह सकते हैं?
कम दिन चलने से जनता को आखिर क्या नुकसान है?
जब सदन नहीं चलता या हंगामे की भेंट चढ़ जाता है, तो नुकसान किसी नेता या पार्टी का नहीं होता, नुकसान सीधा उस आम आदमी का होता है जिसने वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुना था।
बुनियादी समस्याओं की बलि
विधायकों के पास अपने क्षेत्र के स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली और पीने के पानी जैसे मुद्दों को उठाने का सबसे बड़ा हथियार ‘प्रश्नकाल’ और ‘शून्यकाल’ होता है। जब सत्र सवा दिन में सिमट जाएगा, तो जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याएं पटल पर रखेंगे कब? और जब समस्या उठेगी ही नहीं, तो सरकार उसका समाधान क्यों करेगी?
बिना बहस के बनते कानून
गैरसैंण सत्र के इस सवा दिन के भीतर ही 9 विधेयक पेश हो गए और अनुपूरक बजट भी आ गया। जब सदन में बहस ही नहीं होगी, तो विधायकों को विधेयकों की बारीकियों को पढ़ने और समझने का समय कब मिलेगा? नतीजा यह होता है कि भारी-भरकम कानून और नीतियां बिना किसी व्यापक चर्चा के जल्दबाजी में पास कर दी जाती हैं।
आपके गाढ़े पसीने की कमाई का हिसाब कौन देगा?
विधानसभा का एक प्रमुख काम यह देखना है कि जनता के टैक्स का एक-एक रुपया कहां खर्च हो रहा है। छोटे सत्रों के कारण करोड़ों-अरबों रुपयों के बजट की मांगों पर बिना किसी सवाल-जवाब के मुहर लग जाती है (जिसे तकनीकी भाषा में गिलोटिन कहा जाता है)। जब सरकार के खर्चों पर सवाल पूछने वाला ही कोई नहीं होगा, तो भ्रष्टाचार और अनियमितता की गुंजाइश अपने आप बढ़ जाती है।
नौकरशाही की निरंकुशता
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि चुनी हुई सरकार और सरकारी अधिकारी विधायिका के प्रति जवाबदेह हों। जब सत्र ही नहीं चलेंगे, तो मंत्रियों और अफसरों से सवाल कौन पूछेगा? इसका नतीजा यह होता है कि आम जनता को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं और नौकरशाही बेपरवाह हो जाती है।
संसाधनों का सीधा अपव्यय
एक विधानसभा सत्र को आयोजित करने में, विशेषकर गैरसैंण जैसे दूरस्थ स्थान पर पूरा ढांचा खड़ा करने में जनता के टैक्स का भारी पैसा खर्च होता है। जब इतना खर्च करने के बाद भी सिर्फ सवा दिन की औपचारिकता निभाई जाए, तो इसे संसाधनों की बर्बादी के अलावा और क्या कहा जाए?
अब सोचने का वक्त है
सदन चलाना अकेले न तो सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है और न ही केवल विपक्ष की। सत्ता पक्ष को विपक्ष की वाजिब मांगों और चर्चा के प्रस्तावों को सुनने का धैर्य दिखाना होगा, वहीं विपक्ष को भी केवल वेल में आकर नारेबाजी करने और सत्र स्थगित कराने की राजनीति से बाहर निकलना होगा।
गैरसैंण सिर्फ एक ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, वह उत्तराखंड आंदोलन की चेतना का प्रतीक है। अगर वहां भी विधानसभा सत्र सवा दिन में ही समेट दिया जाएगा, तो यह न केवल संविधान की भावना का अनादर है, बल्कि उन आम पहाड़ियों के साथ भी धोखा है जो आज भी अपने हक के सवालों का जवाब ढूंढ रहे हैं।
समय आ गया है कि नियमों में बदलाव कर विधानसभाओं के लिए न्यूनतम कार्यदिवस (जैसे कम से कम 45 या 50 दिन) अनिवार्य किए जाएं, ताकि लोकतंत्र सिर्फ एक औपचारिकता न रहे, बल्कि जनता की आवाज बनने का जरिया बना रहे।








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